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Written on 12:39 AM by KAMAL

‘वर्तमान साहित्य-प्रेमचंद’ कथा पुरस्कार मिलने के अवसर पर कमल का वक्तव्य .

स्थान:- अलीगढ़ विश्वविद्यालय, अलीगढ़ दिनांक:- 29.04.07
‘वर्तमान साहित्य- प्रेमचंद’ कथा पुरस्कार समारोह के इस विशेष अवसर पर उपस्थित आदरणीय लेखकों, विचारकों एवं साहित्य प्रेमियों ! यहां मेरे लिए आज सम्मान्य गायत्री कमलेश्वर, गंगा प्रसाद विमल, काजी अब्दुल सत्तार, कुँवरपाल सिंह और नमिता सिंह की उपस्थिति ही पुरस्कार से बढ़ कर है। मैं यह बात नम्रता व शिष्टता का दिखावा करने के लिए नहीं कह रहा। यह मैंने अपने दिल की बात कही हैं और इस अवसर पर अपनी कहानी व लेखन के बारे में भी अपने दिल की ही बातें करूंगा, जो हो सकता है कहानी के शास्त्र-सम्मत सिद्धांतों पर खरी न उतरें क्योंकि मैं विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूं। वैसे विद्यार्थी विज्ञान का हो, कामर्स का अथवा कला का जीता तो जीवन ही है और मैं मानता हूँ, कहानियां इसी जीवन से आती हैं। न जाने कब, क्यों और कैसे कहानियां, उपन्यास पढ़ते हुए मैं मन ही मन अपने समय और समाज को पढ़ने की कोशिशें करने लगा था। कुछ ‘बहुत अपनों’ के शब्दों में कहूं तो, ‘बेवजह परेशान होने लगा।’ गुरुदेव रवीन्दनाथ टैगोर की ‘... एकला चलो रे’ की तर्ज पर मेरे भीतर भी कहानी का सूत्रपात कोई एक पात्र, घटना या विचार ही करता है और फिर ‘... लोग साथ आते गये और कारवाँ बनता गया’ की तरह कहानी बन जाती है। कभी यह बनना जल्दी तो कभी देर से होता है, जो पूरी तरह कहानी की मर्जी पर निर्भर होता है। मुझ पर तो कत्तई नहीं। ‘प्रोजेक्ट आक्सीजन’ का पहला ड्राट मैंने दिसंबर 2003 में लिखा था और इंप्रूवाइजेशन के साथ अंतिम ड्राफ्ट अगस्त 2006 को ‘वर्तमान साहित्य कहानी प्रतियोगिता’ में भेजा। इस बीच तीसरा सपना, उस पार की आवाज, बाहर वाली कबें, सिक्सर आदि कहानियां तथा संताल और उनकी दुनियां, प्रीतलड़ी की लड़ियां जैसे लेख छपते रहे। लेकिन ‘प्रोजेक्ट आक्सीजन का बंदी मेरे दिलो दिमाग पर लगातार छाया रहा। संभवत: इसमें ज्यादा समय इसलिए लग रहा था कि यह कहानी समाज का दर्पण ही नहीं समाज की टाइम मशीन बन रही थी। एक अध्ययन के अनुसार ग्रीन हॉउस गैसें- मीथेन, क्लोरोलोरो कार्बन, नाइट्रस ऑक्साइड , कार्बन डाइऑक्साइड के उत्पादन में अमेरिका व कनाडा का 81 प्रतिशत व यूरोप का 13 प्रतिशत हिस्सा है जबकि एशिया महाद्वीप का मात्र 6 प्रतिशत। ‘ ग्रीन हॉउस इफैक्ट’ का परिणाम कितना खतरनाक है और होगा, आज इसका अनुमान भी डरावना है। इस प्रकार देखा जाए तो विकसित देशों द्वारा उत्पन्न संकट का सर्वाधिक बुरा परिणाम उन देशों को ही झेलना है जो इस संकट के लिए जिम्मेवार नहीं। क्योंकि इससे बचाव की तकनीक उन देशों के पास नहीं है।
घर में छोटा होने के कारण बचपन में ग्वाले से दूध लाने का काम अक्सर मुझे ही करना पड़ता। ठंड के दिनों में गर्म बिस्तर छोड़ कर जाना जरा भी अच्छा ना लगता। लेकिन मां के यह कहने पर कि देर से जाओगे तो ग्वाला दूध में पानी मिला देगा, मैं उठ जाता। वहां पहुंच कर मुझमें और ग्वाले में प्रतियोगिता सी होती, वह अवसर देख पानी मिलाना चाहता और मैं उसे वैसा करते रंगे हाथों पकड़ना। लेकिन ज्यादातर वही सफल होता। तब मुझे कहाँ पता था कि वह ग्वाला ‘तीसरा सपना’ का भुजंग बन जाएगा। ऐसे ही डालटनगंज जेल में मिला बंदी ‘नमो सत्यम’ का बद भगत मुझसे पूछ कर तो नहीं बना। हां यह जरूर है कि जब उसने बनना चाहा तो मैंने भी नहीं रोका, बल्कि उसका स्वागत ही किया। मैं किसी को भी कभी नहीं रोकता, बस एक बात का ध्यान रखता हूं, वैसा करते हुए उनका कहानीपन बरकरार रहे और कहानी कोई अबूझ पहेली अथवा उबाऊ प्रवचन न बन जाए।
आदरणीय मित्रों, जी हां मैं सपने देखता हूं। मुझे जागते और सोते दोनों अवस्थाओं में सपने आते हैं। प्रसिद्ध रसायनशास्त्री केकुले ने भी अगर सपने में सांप को अपनी पूंछ अपने ही मुंह में लेने की कोशिश करते न देखा होता तो प्रसिद्ध ‘बेंजीन रिंग’ का सूत्र कहां से आता? शायद इसीलिए मेरे कथा-पात्रों को भी सपने देखने में कोई परहेज नहीं होता। चाहे वह ‘प्रोजेक्ट आक्सीजन ’ का अमन हो, ‘तीसरा सपना’ का भुजंग, पल्टू अथवा वर्मा जी, ‘बाहर वाली कब’ का प्रतीक, ‘प्यार के दो चार पल’ का अनुभव या उपन्यास ‘आखर चौरासी’ का डा. जगीर सिंह और गुरनाम। सपने जो प्यारे होते हैं और डरावने भी, रंगीन होते हैं और बदरंग भी, अतीत दिखाते हैं और भविष्य भी। मुझे लगता है, वास्तविक जीवन के समानांतर उतनी ही विपुल और भिन्नताओं वाली होती है हमारे सपनों की दुनिया भी। दुनिया में दुखों और आंसुओं का एक ही देश, जाति, धर्म और रूप होता है। इस कायनात में सबसे सच्चा और गहरा रिश्ता तो दर्द का ही होता है। सपने देखते हुए जब कभी परेशानी बहुत बढ़ जाती है तब कबीर धीमे से कानों में हौसला बढ़ाते हैं- ‘सुखिया सब संसार है खावै और सोये, दुखिया दास कबीर है जागै औ रोवे।’
कहानी मेरे लिए कभी भी मात्र मन बहलाव, समय काटने अथवा अ¸याशी करने का सबब नहीं रही। कहानी अपने समय और समाज के संघर्षों, दबावों को झेलने, उन्हें परास्त कर जीवन को जीने लायक बनाने में इंसान के साथ खड़ी हो, परेशान मनों को राहत पहुंचाये, जीवन को जीने की ताकत देती लगे-यह देखने की इच्छा रही है। प्रेमचंद, भीष्म साहनी, कमलेश्वर, चेखव, गोर्की, काका, से लेकर कुँवरपाल सिंह, नमिता सिंह आदि कई लेखकों की कहानियों ने मेरे इस विश्वास को बल दिया है कि कहानियां ऐसी ही होती हैं।
यही कोई सन चौहत्तर-पचहत्तर में कक्षा पांच या छ: की बात होगी। मंझले भैया ‘सारिक’ लाते थे। कहानियां लेखक लिखते हैं, संपादक उनका चुनाव करते और छापते हैं, इन बातों की मुझे न तो जानकारी थी, न ही जानने में कोई दिलचस्पी। ‘सारिका’ कहानियों की पत्रिका हैं, मेरे लिए बस यही काफी था। मुझे तो बस कहानियां पढ़नी होती थी घर में सबसे छोटा होने के कारण भैया की उपस्थिति में तो बड़ों की पत्रिका ‘सारिका’ छू नहीं सकता था। इसलिए जब भी वे बाहर और मैं घर में होता, ले कर बैठ जाता। उस उम में वे कहानियां तो क्या समझ में आतीं, लेकिन उन कहानियों को पढ़ने का ऐसा चस्का लगा कि ‘सारिका’ पढ़े बगैर मन नहीं मानता था। जिस दिन नया अंक आता, उस शाम मैं अपने हमउम साथियों के साथ बाहर खेलने नहीं जाता। क्योंकि शाम का वक्त भैया के टहलने का होता था। कई शामें मैंने बचपन के दोस्तों के साथ खेलने से ज्यादा तरजीह ‘सारिका’ पढ़ने को दी। तब मैं कहानियां पढ़ना सीख रहा था, आज कहानियां लिखना सीख रहा हूं।
मंटो ने कहा था मैं कहानी को नहीं लिखता, कहानी मुझे लिखती है। ‘प्रोजेक्ट आक्सीजन ’ ने भी मुझे लिखा है, तभी तो आज मैं आप सब के सामने हूं। इसे पुरस्कृत कर मुझे कहानी लिखना सीखने में मदद करने के लिए मैं वर्तमान साहित्य परिवार, इस प्रतियोगिता के निर्णायकों, खासतौर पर ऐतिहासिक अलीगढ़ शहर, अलीगढ़ वासियों और अलीगढ़ विश्वविद्यालय का शुक्रगुजार हूं। मुझे मिले इस पहले पुरस्कार का महत्व मेरे लिए पहले नशे और पहले प्यार की तरह है। यह पुरस्कार कमलेश्वर जी के हाथों से मिलना था और मिल रहा है गायत्री व कमलेश्वर दोनों के हाथों से। नयी रचनाशीलता को सदैव प्रोत्साहित करने वाले कमलेश्वर जी के साथ-साथ आप सबका यह अविस्मरणीय स्नेह प्रणाम्य गायत्री कमलेश्वर जी के हाथों प्राप्त कर मुझे बल मिला है। विनम्रता व प्रसन्नता से इसे स्वीकार करते हुए मैं हृदय की असीम गहराई से आप सबका आभार प्रकट करता हूं।

धन्यवाद!

डाक-- डी- 1/1 मेघदूत अपार्टमेंटस, मरीन ड्राइव रोड, पो-कदमा, जमशेदपुर-831005 झारखंड.

दूरभाष - 09431172954 0657-2310149½

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